जब मैंने अपने मन को नज़रअंदाज़ करना सीख लिया
उस सुबह मेरा मन मुझसे पहले जाग गया था।
वह बीते कल की गलतियाँ गिना रहा था, आने वाले कल की चिंताएँ दिखा रहा था, और बता रहा था कि सब कुछ कितना मुश्किल है।
मेरा शरीर अभी बिस्तर पर था, लेकिन मन दौड़ चुका था।
उस दिन मैंने मन से लड़ने के बजाय एक अलग फैसला लिया — मैंने उसे अनसुना कर दिया।
मैंने बिना सोचे दाँत ब्रश किए। बिना योजना बनाए चाय पी। फर्श पर पड़ती धूप को बस देखा, उस पर कोई राय नहीं बनाई।
मन चिल्लाता रहा —
“ऐसे कैसे चलेगा?”
“भविष्य के बारे में सोचो!”
“चिंता करना ज़रूरी है!”
लेकिन मैंने जवाब नहीं दिया।
धीरे-धीरे शोर कम होने लगा। सीने का बोझ हल्का पड़ने लगा। ज़िंदगी आसान लगने लगी — इसलिए नहीं कि समस्याएँ खत्म हो गईं, बल्कि इसलिए कि मैं उन्हें हर पल ढो नहीं रहा था।
तभी समझ आया —
मन एक औज़ार है, मालिक नहीं।
जब हम उसे आँख बंद करके मानते हैं, वह डर पैदा करता है। और जब हम उसे प्यार से नज़रअंदाज़ करते हैं, तो वह जगह बनाता है।
उस दिन मैंने एक शांत सच जाना:
शांति हर विचार को ठीक करने से नहीं मिलती, बल्कि हर विचार पर भरोसा न करने से मिलती है।
और बहुत समय बाद, मैं मन से पहले सो गया।
